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03 July 2015

नए सपने पुराने तंत्र के हवाले--हरजिंदर हेड-थॉट, हिन्दुस्तान

डिजिटल इंडिया अभियान कैसे भारत का निर्माण करेगा, यह अभी हम नहीं कह सकते, लेकिन नौकरशाही ऐसे अभियानों का कैसा हश्र कर सकती है, इसकी भूमिका कुछ हद तक दूरसंचार विभाग की एक कमेटी ने पहले ही लिख दी है। नेट तटस्थता पर बनी इस समिति ने अपनी रिपोर्ट ने कहा है कि व्हाट्सएप, बाइबर और स्काइप जैसी  इंटरनेट के जरिये बातचीत वाली सेवाओं को अगर भारत में काम करना है, तो उन्हें इसके लिए लाइसेंस लेना होगा। यह सिफारिश नेट तटस्थता के सिद्धांत के खिलाफ तो जाती ही है, साथ ही भविष्य की कई उम्मीदों और दरवाजों को बंद करने वाली है। यह मुद्दा तो खैर है ही कि अगर कोई इंटरनेट सेवा के लिए पैसे खर्च कर रहा है, तो वह उसका इस्तेमाल किस तरह से करता है और उसके जरिये अपने खर्च में कमी करने के कौन-कौन से जुगाड़ करता है, इसे पूरी तरह उसी पर छोड़ दिया जाना चाहिए। यह बात भी समझी जा सकती है कि इससे टेलीफोन सेवा देने वाली कंपनी के मुनाफे पर असर पड़ सकता है, लेकिन इसमें सरकार को दिक्कत क्यों है, यह बात आसानी से समझ में नहीं आती। इससे भी बड़ा मुद्दा यह है कि स्मार्टफोन के जरिये हर रोज नई संभावनाएं सामने आ रही हैं, इनमें से कुछ ऐसी भी होंगी, जिनका मौजूदा सेवाओं पर असर पड़ेगा, तो क्या हम हर बार पुरानी सेवाओं और तकनीक को बचाने के लिए नई संभावनाओं का रास्ता यूं ही रोकते रहेंगे?
ऐसा ही एक दूसरा उदाहरण वाई-फाई सेवा का है। देश में कई जगह सार्वजनिक वाई-फाई सेवा शुरू हो चुकी है। अगले कुछ समय में इसका बहुत तेजी से विस्तार होना है- स्टेशनों, हवाई अड्डों, पर्यटन स्थलों, राजमार्गों वगैरह के लिए कई योजनाओं पर काम शुरू हो चुका है। दिल्ली सरकार तो पूरी दिल्ली में ही मुफ्त वाई-फाई सेवा देने का ऐलान कर चुकी है। देश को नए दौर में ले जाने में ऐसी चीजें महत्वपूर्ण भूमिका निभा सकती हैं। पर लोगों के लिए यह सेवा किसी काम की न रह जाए, इसके लिए  नौकरशाही ने कमर कस ली है। सेवा शुरू होने से पहले ही हर जगह यह बताया जा रहा है कि सार्वजनिक वाई-फाई का इस्तेमाल आप सोशल मीडिया के लिए नहीं कर सकेंगे, आप इससे ई-मेल नहीं भेज सकेंगे, सार्वजनिक वाई-फाई से नेट सर्फिंग नहीं हो सकेगी। तो फिर सार्वजनिक वाई-फाई किस मर्ज की दवा होगी? तो क्या इसका इस्तेमाल सिर्फ मन की बात सुनने के लिए ही हो सकेगा?

बेशक, डिजिटल इंडिया के लिए जो योजनाएं बनाई गई हैं, वे काफी आकर्षक भी हैं और महत्वपूर्ण भी- ई-अप्वॉइंटमेंट से लेकर ई-लॉकर और ई-बस्ता तक। समस्या इन योजनाओं में नहीं है, समस्या उस तंत्र को लेकर है, जिसके हवाले इन योजनाओं को कर दिया जाएगा। अभी इन योजनाओं को लोगों के लिए सुविधा की तरह पेश किया जा रहा है, लेकिन कोई आश्चर्य नहीं कि आने वाले समय में ये नई असुविधाओं का रास्ता तैयार कर दें। देश में कई बड़े बदलाव लाने में नई तकनीक महत्वपूर्ण भूमिका निभा सकती है, लेकिन सिर्फ इतना काफी नहीं है। बदलाव में तकनीक की भूमिका एक औजार की होती है, लेकिन बदलाव की शुरुआत तब होती है, जब उस तंत्र की सोच भी बदली जाए, जिसके हाथ में यह औजार पकड़ाया जा रहा है। यह अच्छा है कि स्मार्टफोन के युग में हम बहुत सारी स्मार्ट व्यवस्थाएं बना रहे हैं। यह उम्मीद भी बांध रहे हैं कि इन व्यवस्थाओं से जुड़ने वाले लोग स्मार्ट नागरिक बन जाएंगे। लेकिन सवाल यह है कि हम अपने प्रशासन, अपनी पुलिस और न्यायपालिका को स्मार्ट कब बनाएंगे? यह ऐसा काम है, जो सिर्फ थानों को कंप्यूटर नेटवर्क से जोड़ देने भर से पूरा नहीं होगा। इसके लिए हमें प्रशासनिक सुधार, पुलिस सुधार और न्यायिक सुधार करने ही होंगे। बिना इन सुधारों के डिजिटल इंडिया भी वैसा ही बनेगा, जैसा पिछले दिनों हमने स्वच्छ भारत बनाया था। डिजिटल इंडिया के नए सपने और प्रशासन का पुराना तंत्र, दोनों एक साथ नहीं चल सकते।

डिजिटल इंडिया और स्मार्ट सिटी जैसी योजनाएं बनाने वाली सरकार ने इन दिनों एक और बीड़ा उठाया है, और वह है 1975 के संपूर्ण क्रांति आंदोलन के नेता जय प्रकाश नारायण का स्मारक बनाने का। डिजिटल इंडिया में जय प्रकाश नारायण का जिक्र विषयांतर जैसा लग सकता है, लेकिन यहां उनकी याद किसी दूसरे कारण से आ रही है। जय प्रकाश नारायण कहते थे कि अगर देश की मौजूदा योजनाओं को ही पूरी ईमानदारी से लागू कर दिया जाए, तो देश में एक छोटी-सी क्रांति आ सकती है। वह मानते थे कि देश का मौजूदा तंत्र इसमें सबसे बड़ी बाधा है। हमारी दिक्कत यह है कि हम योजनाएं बनाकर उस तंत्र के हवाले कर देते हैं, जो न तो उस योजना की मूल भावना से जुड़ा होता है, और न ही उसमें योजना को लागू करने की इच्छाशक्ति और प्रतिबद्धता होती है। जब तक यह नहीं बदलेगा, डिजिटल इंडिया या स्मार्ट सिटी से बहुत बड़ी उम्मीद नहीं पाली जा सकती।

डिजिटल इंडिया की अगली चुनौती और भी बड़ी है। यह चुनौती है पूरे देश को इस योजना से जोड़ने की। यानी इस योजना को समावेशी बनाने की। मौजूदा रूप में तो डिजिटल इंडिया जैसी योजना स्मार्ट सिटी के अलावा देश के नगरों में काफी कुछ लागू हो सकती है। लेकिन इसके आगे की राह बहुत कठिन होगी। हमें नहीं पता कि इसे उन गांवों और कस्बों में कैसे पहुंचाया जाएगा, जहां बिजली ही ठीक से नहीं पहुंचती? उन लोगों तक कैसे पहुंचाया जाएगा, जो अब भी निरक्षर हैं? और शिक्षा के अधिकार के बावजूद उनकी अगली पीढ़ी डिजिटल इंडिया के उपयोग लायक साक्षर बन पाएगी, इसकी बहुत उम्मीद नहीं बंधती। उन लोगों के लिए कैसे उपयोगी बनाया जाएगा, जो स्वस्थ जीवन जीने लायक भोजन भी नहीं जुटा पाते?

डिजिटल इंडिया जैसी योजनाओं की हमें जरूरत है, लेकिन सिर्फ इसलिए नहीं कि हम इसके जरिये दुनिया के विकसित देशों की बराबरी कर सकें, बल्कि इसके जरिये हम अपने तंत्र को बदल सकें। ऐसी योजना, जो हमारे तंत्र और हमारी अर्थव्यवस्था को उसके वात, कफ व पित्त से मुक्ति नहीं दिला सकती, वह कितनी भी बड़ी और आधुनिक क्यों न हो, अंत में हमें कहीं नहीं ले जाएगी। डिजिटल इंडिया कार्यक्रम तभी सार्थक हो सकता है, जब वह सिर्फ कुछ लोगों की सुविधा भर न रह जाए, बल्कि सभी लोगों के लिए समाधान का जरिया बने।

साभार-'हिंदुस्तान'-02/जुलाई/2015 

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