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12 April 2018

यही पूजा है तो ......

यही पूजा है कि जो आसिफा तुम्हारे साथ हुआ ?
यही पूजा है कि जो निर्भया तुम्हारे साथ हुआ ?

यही पूजा है कि जो भजन यहाँ पर गाए जाएँ ?
यही पूजा है कि जो सारे सपने बिखराए जाएँ ?

यही पूजा है तो देवता करें अब वास कहाँ पर ?
यही पूजा है तो नवरात्रों के हों उपवास कहाँ पर ?

यही पूजा है तो 'आदि शक्ति' किसे कहोगे ?
यही पूजा है तो 'माँ' की  भक्ति किसे कहोगे ?

यही पूजा है तो 'धर्म' पर प्रश्न चिह्न क्यों लगाते हो ?
यही पूजा है तो जय-जयकारे क्यों लगाते हो ?

यही पूजा है  कि समझ लो पूजा मन से जाता है 
यही पूजा है कि कोई धर्म  बैर नहीं सिखाता है । 

यही पूजा है कि हर नारी को अधिकार और मान दो 
उसकी देह और उसके मन को उसका उचित सम्मान दो। 


-यश ©
12/04/2018

07 April 2018

देहदान कर देना


जब नहीं हों मुझमें प्राण,
इतना एहसान कर देना
अंतिम इच्छा यही कि
मेरा देहदान कर देना।
जीते जी कुछ किया न मैंने
स्वार्थी जीवन बिताया है
यूं ही कटे दिन रात , समझ
कभी न कुछ भी आया है।
क्या होगा शमशान में जल कर
क्या होगा किसी कब्र में दब कर
चार कंधों पर ढोकर सबने
राम नाम ही गाया है।
मन तो व्यर्थ रहा ही मेरा
तन को नष्ट न होने देना
अंग हों जो भी काम के मेरे
जीवन उनसे किसी को देना ।
मृत शरीर अनमोल है इससे
नयी खोजें हो जाने देना
दान देह का सबसे बड़ा है
इसको व्यर्थ न जाने देना।

-यश ©

06 April 2018

दुनिया बड़ी ज़ालिम है

ये दुनिया बड़ी ज़ालिम है
इससे कोई बात न करना
चार दिन की महफिल में
खुद को बरबाद न करना ।

कुछ पल का है हँसना रोना
कुछ पल की सब बातें हैं
बाकी तो बस तनहाई में
यूं कटते दिन और रातें हैं ।

चेहरे से सब अपने लगते
भीतर से सब पराए हैं
अपनी अपनी कहने सुनने
कई रूप धर कर आए हैं ।

कागज़ कलम हैं सच्चे साथी
और किसी से आस न रखना
आस्तीन के साँप बहुत हैं
उनको अपने पास न रखना ।

-यश ©
06/04/2018 

31 March 2018

मौन के एकांत में

मौन के एकांत में
कहीं खो कर
किसी निर्वात के
हवाले हो कर
सोच रहा हूँ
खुद पर लगे
प्रश्न चिह्न हटाने की
खुद से खुद की
दूरियाँ मिटाने की
यह  समय
जो अपने हर पल
ले रहा है मेरा इम्तिहान
कातिलाना होकर
न जाने क्यों
मुझ पर चाह रहा है
टूट पड़ना
न जाने क्यों
चाह रहा है
मुझ से लड़ना
खैर
मुझे लड़ना है
खुद के उस अबूझ
अन-सुलझे
आवरण से
जो अनचाहे ही
चस्पा हो गया है
मेरे चेहरे पर।

यश ©
31/03/2018 

26 March 2018

मैं !

मैं !
बस अपनी कल्पनाओं में
खोया सा रह कर
अनजान सपनों से
अपने मन की
कुछ -कुछ कह कर
कभी -कभी
तांक-झांक लेता हूँ
इधर-उधर ।

मैं !
खुद को जानने की
जितनी कोशिशें करता हूँ
उतना ही अनजान बनता चला जाता हूँ
अपने अतीत और वर्तमान से ।

मैं !
बौराए आम के बागों में
चहलकदमी करता हुआ
हमराहियों के चेहरे पढ़ता हुआ
झपकती पलकों से
अनगिनत प्रश्न करता हुआ
हैरानी से देखता हूँ
जिंदगी के पहियों को
कभी घिसटते हुए
कभी आराम से चलते हुए।

मैं !
अपनी सोच के सीमित दायरे में
अपनी ही लिखी किताब पर
उकेर देता हूँ
कई और इबारतें
देखता हूँ
एक के ऊपर एक
शब्दों और अक्षरों के
जटिल पिरामिडों को
आकार लेते हुए
बस अपनी कल्पनाओं में
खोया सा रह कर
यूं ही बेमतलब की
लिखकर-कहकर
बना रहता हूँ अनजान
आने वाले
हर तूफान की आहट से।

-यश©
26/03/2018

कौन हूँ मैं


पूछ रहा हूँ खुद से 
कि कौन हूँ मैं । 
कहीं अंधेरे में छुपा 
अनकहा मौन हूँ मैं ।

मैंने धोखे खाए हैं 
उजालों से हर दफा 
कहीं कब्र में दफनाए हैं 
अपने ख्याल हर मर्तबा

सच की इबारत हूँ 
या तिलिस्मी झूठ हूँ मैं ?
पूछ रहा हूँ खुद से कि कौन हूँ मैं ।

-यश ©
14/02/2018

16 March 2018

मैं देवी हूँ-9 (नवरात्रि विशेष)

इन नौं दिन
तुमने पूजा है
पत्थर की मेरी मूरत को। 
उसमें प्राण-प्रतिष्ठा कर के
तुमने मांगी हैं मन्नतें
दु:ख के जाने और
सुख के आने की।
सप्तशती के
सात सौ श्लोकों के साथ 
तुमने रखे हैं
फलाहार और निर्जल व्रत।

लेकिन कभी सोचा है
क्या होगा इस सबसे ?

क्या बदल पाए हो
खुद की नज़रों और
नजरिए को ?

क्या निकल पाए हो
अपनी पुरातन सोच के
दायरे से ?

नहीं
कुछ बदलाव नहीं होगा
बस भ्रम बना रहेगा
यूं ही चारों ओर
क्योंकि
तुम्हारी हर क्रिया-प्रतिक्रिया का
रहस्य मैं जानती हूँ
मैं! देवी हूँ।

-यश ©
16/03/2018


मैं देवी हूँ-8 (नवरात्रि विशेष)

मैं!
बन कर रह गयी हूँ
पैमाना
सिर्फ
अपने रूप-रंग
और वाह्य आकर्षण का ही।

मुझे मापा जाता है
मेरे गोरा या काला होने से
पतला या मोटा होने से
लंबा या नाटा होने से
अनपढ़ या पढ़ा लिखा होने से ।

मुझे तोला जाता है
मेरे पिता की संपत्ति के तराजू में
जिसके एक पलड़े पर
होने वाले दामाद की
सरकारी नौकरी बैठती है
और दूसरे पलड़े पर
खैरात की कार,बाइक
और अन-गिनत अपेक्षाएँ
कोशिश करती हैं
संतुलन बनाने की।

खुद ही
खुद के हक से वंचित हो कर
इस विकसित युग में भी
कई बेड़ियों से
जकड़ी हुई हूँ
मैं ! देवी हूँ।

-यश ©
16/03/2018

मैं देवी हूँ -7 (नवरात्रि विशेष)

कई रूप
कई स्वरूप हैं मेरे
लेकिन क्या
मेरे 'स्वयं' के दर्शन
कभी कर पाई हूँ ?
अपने पिता-भाई
और माँ के लिए
पराई हूँ
श्वसुराल में
बाहर से आई हूँ।

मेरी खुद की
इच्छाएँ
महत्त्वाकांक्षाएँ 
दब जाती हैं
हर देहरी के भीतर
क्योंकि मुझे
जानने -समझने
और मानने वाला
दूर -दूर तक
कोई नहीं।

मैं!
खुद ही निराशा में
आशा को ढूंढती फिरती हूँ
खुद से ही
खुद की बातें किया करती हूँ
मैं! देवी हूँ।

-यश ©
16/03/2018

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