ये जो सूरज है
उगते देखता हूँ जिसे
पहाड़ों के बीच से
पेड़ों की ओट से
ऊंची अट्टालिकाओं के
किसी कोने से
खिलते देखता हूँ
इसकी पहली किरण को
मगर आज
ये सूरज
उग आया है
मेरी हथेली के बीच से
शायद यहीं कहीं छिपा बैठा था
मेरे मन मस्तिष्क में
मैं जिस को तलाश रहा था
वो मेरे भीतर ही था
मैं भटक रहा था
और वो हंस रहा था
मेरी मूर्खता पर
मगर आज
मैं भूल चुका हूँ
दुनिया को
और समा चुका हूँ
मैं मिल चुका हूँ
इसी सूरज की
किरणों में कहीं
मैं खो चुका हूँ
लेकिन
भूला नहीं हूँ
अपना अतीत
मैं क्या था
और
क्या हो गया हूँ
ये जो सूरज है
ReplyDeleteउगते देखता हूँ जिसे
पहाड़ों के बीच से
पेड़ों की ओट से
ऊंची अट्टालिकाओं के
किसी कोने से
खिलते देखता हूँ
इसकी पहली किरण को
गजब कि पंक्तियाँ हैं ...
गहराई से लिखी गयी एक सुंदर रचना...
ग़ज़ब की कविता ... कोई बार सोचता हूँ इतना अच्छा कैसे लिखा जाता है
ReplyDeleteचित्र काफी खूबसूरत हैं ।
ReplyDeleteइतनी सुंदर रचना...ये तो चित्र से भी कहीं अच्छी है...मैं क्या कहूं...चित्र भी सार्थक हो गया...
ReplyDeleteबहुत दिनों बाद इतनी प्यारी सी रचना पढने को मिली..यूँ ही लिखते रहें....
ReplyDeleteमेरे ब्लॉग पर इस बार
एक और आईडिया....
बहुत लाजवाव लिखा है
ReplyDeleteबहुत अच्छा
कभी फुरसत मिले तो यहाँ भी आइये
www.deepti09sharma.blogspot.com
Respected Veena ji,Sanjay ji,Deepti ji,Shekhar ji
ReplyDeleteThank you so much for your liking this & your comments.
@ Respected Veena ji---I have no words to say thanks for your valuable support & motivation.
bahut sunderta se likhi hai.
ReplyDeleteहथेली पर सूरज उगा कर ही इस दुनियाँ मे इन्सान कुछ कर सकता है। बहुत सुन्दर प्रेरक कविता । बधाई।
ReplyDeleteBeautiful poem !--Full of positive energy !
ReplyDeleteThank you so much Respected Mridula ji,Nirmla ji & Divya ji.
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