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11 October 2010

मन का सूरज


ये जो सूरज है
उगते देखता हूँ जिसे
पहाड़ों के बीच से
पेड़ों की ओट से
ऊंची अट्टालिकाओं के
किसी कोने से
खिलते देखता हूँ
इसकी पहली किरण को

मगर आज
ये सूरज
उग आया है
मेरी हथेली के बीच से
शायद यहीं कहीं छिपा बैठा था
मेरे मन मस्तिष्क में
मैं  जिस को तलाश रहा था
वो मेरे भीतर ही था

मैं भटक रहा था
और वो हंस रहा था
मेरी मूर्खता  पर

मगर आज
मैं भूल चुका हूँ
दुनिया को
और समा चुका हूँ
मैं मिल चुका हूँ
इसी सूरज की
किरणों में कहीं
मैं खो चुका हूँ

लेकिन
भूला नहीं हूँ
अपना अतीत
मैं क्या था
और
क्या हो गया हूँ




11 comments:

  1. ये जो सूरज है
    उगते देखता हूँ जिसे
    पहाड़ों के बीच से
    पेड़ों की ओट से
    ऊंची अट्टालिकाओं के
    किसी कोने से
    खिलते देखता हूँ
    इसकी पहली किरण को

    गजब कि पंक्तियाँ हैं ...

    गहराई से लिखी गयी एक सुंदर रचना...

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  2. ग़ज़ब की कविता ... कोई बार सोचता हूँ इतना अच्छा कैसे लिखा जाता है

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  3. चित्र काफी खूबसूरत हैं ।

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  4. इतनी सुंदर रचना...ये तो चित्र से भी कहीं अच्छी है...मैं क्या कहूं...चित्र भी सार्थक हो गया...

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  5. बहुत दिनों बाद इतनी प्यारी सी रचना पढने को मिली..यूँ ही लिखते रहें....

    मेरे ब्लॉग पर इस बार
    एक और आईडिया....

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  6. बहुत लाजवाव लिखा है
    बहुत अच्छा

    कभी फुरसत मिले तो यहाँ भी आइये
    www.deepti09sharma.blogspot.com

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  7. Respected Veena ji,Sanjay ji,Deepti ji,Shekhar ji
    Thank you so much for your liking this & your comments.

    @ Respected Veena ji---I have no words to say thanks for your valuable support & motivation.

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  8. हथेली पर सूरज उगा कर ही इस दुनियाँ मे इन्सान कुछ कर सकता है। बहुत सुन्दर प्रेरक कविता । बधाई।

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  9. Beautiful poem !--Full of positive energy !

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  10. Thank you so much Respected Mridula ji,Nirmla ji & Divya ji.

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