प्रतिलिप्याधिकार/सर्वाधिकार सुरक्षित ©

इस ब्लॉग पर प्रकाशित अभिव्यक्ति (संदर्भित-संकलित गीत /चित्र /आलेख अथवा निबंध को छोड़ कर) पूर्णत: मौलिक एवं सर्वाधिकार सुरक्षित है।
यदि कहीं प्रकाशित करना चाहें तो yashwant009@gmail.com द्वारा पूर्वानुमति/सहमति अवश्य प्राप्त कर लें।

यदि आप चाहें तो हमें कुछ सहयोग कर सकते हैं

14 January 2011

ओ! हवा की लहरों

ओ!पल पल बहती
जीवनदायिनी हवा की लहरों
कुछ ठहर कर
आज मुझ से कुछ बातें कर लो
तुम छू कर मुझे निकल जाती हो
अनंत की ओर
मेरे जैसे और भी बहुतों को
देती हो एहसास जीवन का
तो क्यूँ न
दो पल का विराम ले कर
कुछ अपनी कह दो
और कुछ मेरी सुन लो
पर मैं जानता हूँ
तुम्हारे ठहरने मात्र से ही
कितने ही ठहर जायेंगे
मैं चाहता  हूँ
और सिर्फ चाहता ही रह जाऊँगा
और तुम बहती रहोगी
अनवरत
शायद रुकना तुमको आता ही नहीं
चलते वक़्त की तरह.

20 comments:

  1. मैं चाहता हूँ
    और सिर्फ चाहता ही रह जाऊँगा
    और तुम बहती रहोगी
    अनवरत
    शायद रुकना तुमको आता ही नहीं
    चलते वक़्त की तरह.

    Bahut khoob !

    ReplyDelete
  2. दायित्व बोध की कविता ..सुंदर

    ReplyDelete
  3. सचमुच कहाँ ठहरती है...जीवनदायिनी हवा.... सुंदर अभिव्यक्ति....

    ReplyDelete
  4. thahar bhi jao... kuch kah lo , main bhi ji lun un baaton mein

    ReplyDelete
  5. havaon se rukne ki bat na na , sundar rachna , badhai

    ReplyDelete
  6. मैं चाहता हूँ
    और सिर्फ चाहता ही रह जाऊँगा
    और तुम बहती रहोगी
    अनवरत
    शायद रुकना तुमको आता ही नहीं
    चलते वक़्त की तरह.

    हरेक चाह कहाँ पूरी होती है..हवा की नियति है निरंतर बहना..बहुत भावपूर्ण प्रस्तुति.

    ReplyDelete
  7. अच्छी अभिव्यक्ति |बधाई |
    मकर संक्रांति पर शुभ कामनाएं |
    आशा

    ReplyDelete
  8. शायद रुकना तुमको आता ही नहीं
    चलते वक़्त की तरह
    khubsurat yehsas

    ReplyDelete
  9. बेहद खूबसूरत!

    ReplyDelete
  10. बस बहुत सुंदर....बहुत खूब...इससे ज्यादा कुछ नहीं कह सकती.....

    ReplyDelete
  11. आज मुझ से कुछ बातें कर लो
    तुम छू कर मुझे निकल जाती हो
    अनंत की ओर
    मेरे जैसे और भी बहुतों को
    देती हो एहसास जीवन का
    इन पंक्तियों ने दिल छू लिया... बहुत सुंदर ....रचना....

    ReplyDelete
  12. हवा की फितरत को सही पहचाना है। हार्दिक बधाई। इसीलिए जीवन भी चलने का नाम माना जाता है।

    ---------
    डा0 अरविंद मिश्र: एक व्‍यक्ति, एक आंदोलन।
    सांपों को दुध पिलाना पुण्‍य का काम है?

    ReplyDelete
  13. अदभुत वर्णन ...
    सुन्दर रचना ......

    ReplyDelete
  14. सुंदर अभिव्यक्ति....!!

    ReplyDelete
  15. बहुत ही सुंदर रचना.....बधाई...

    ReplyDelete
  16. बहुत सुंदर रचना......बधाई.

    ReplyDelete
  17. इन पंक्तियों को पसंद करने के लिए आप सभी का बहुत बहुत धन्यवाद.

    ReplyDelete

Popular Posts

+Get Now!