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28 January 2011

एक प्रश्न

बिन आहट आकर के क्यों 
मेरी तन्हाईयाँ छीन लीं तुमने  
मैं अकेलेपन में जीता था 
मेरी परछाईयाँ छीन लीं तुमने 

क्यों इस कदर अपनापन 
क्यों ये मोहब्बत दिखाते हो 
मावस की रात में क्यों 
चांदनी बन जाते हो 

ये जान कर कि तुम को 
दिया कुछ भी नहीं मैंने
फिर अपना हमकदम क्यों 
मुझको चुन लिया तुमने

और भी बहुत से होंगे
तेरी खुशबू को चाहने वाले
मैं भंवर नहीं फिर भी कैसे
मुझे महसूस लिया तुमने ?

20 comments:

  1. बहुत मासूम से खूबसूरत सवाल करती प्रभावी रचना ..

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  2. मासूम सवाल ....सुंदर रचना

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  3. ला-जवाब" जबर्दस्त!!

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  4. खूबसूरत भावों से सजी रचना .कोमल सा एहसास लिए

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  5. बिन आहट आकर के क्यों
    मेरी तन्हाईयाँ छीन लीं तुमने
    मैं अकेलेपन में जीता था
    मेरी परछाईयाँ छीन लीं तुमने

    मैं अकेलेपन में जीता था और यहां तक कि मेरी परछांईया भी छीन ली
    बहुत खूब...बहुत सुंदर भाव...

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  6. बिन आहट आकर के क्यों
    मेरी तन्हाईयाँ छीन लीं तुमने
    मैं अकेलेपन में जीता था
    मेरी परछाईयाँ छीन लीं तुमने
    bahut badhiyaa

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  7. कोमल भावों से परिपूर्ण बहुत सुन्दर रचना..

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  8. बहुत सुन्दर मन के भाव। वाजिब सवाल। बधाई।

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  9. इन पंक्तियों को पसंद करने के लिए आप सभी का बहुत बहुत धन्यवाद.

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  10. चर्चा मंच के साप्ताहिक काव्य मंच पर आपकी प्रस्तुति मंगलवार 01- 02- 2011
    को ली गयी है ..नीचे दिए लिंक पर कृपया अपनी प्रतिक्रिया दे कर अपने सुझावों से अवगत कराएँ ...शुक्रिया ..

    http://charchamanch.uchcharan.com/

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  11. बिन आहट आकर के क्यों
    मेरी तन्हाईयाँ छीन लीं तुमने
    मैं अकेलेपन में जीता था
    मेरी परछाईयाँ छीन लीं तुमने



    बहुत सुंदर रचना .
    best wishes.

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  12. बहुत ही सुन्‍दर भावमय करते शब्‍द ।

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  13. अत्यंत आत्मीय एवं अंतरंग सी अभिव्यक्ति ! बहुत सुन्दर !

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  14. बेहद भावमयी और खूबसूरत अभिव्यक्ति. आभार.
    सादर,
    डोरोथी.

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  15. मैं अकेलेपन में जीता था
    मेरी परछाईयाँ छीन लीं तुमने

    बहुत बढ़िया...

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