प्रतिलिप्याधिकार/सर्वाधिकार सुरक्षित ©

इस ब्लॉग पर प्रकाशित अभिव्यक्ति (संदर्भित-संकलित गीत /चित्र /आलेख अथवा निबंध को छोड़ कर) पूर्णत: मौलिक एवं सर्वाधिकार सुरक्षित है।
यदि कहीं प्रकाशित करना चाहें तो yashwant009@gmail.com द्वारा पूर्वानुमति/सहमति अवश्य प्राप्त कर लें।

30 March 2013

दरारें और दीवारें

नया नहीं
दीवारों
और दरारों का साथ
दीवारे
ईंटों की भी होती हैं
और
रिश्तों की भी
कुछ ऊंची होती हैं
कुछ नीची होती हैं
और कुछ
कर रही होती हैं
नींव के
रखे जाने का
इंतज़ार

वक़्त के साथ
या लापरवाही से
गलतफहमी के
उफनने से
नींव के दरकने से
भूकंप से
दरारें पड़ ही जाती हैं
ईंटों की दीवारें
गिर ही जाती हैं
रिश्तों की दीवारें
उठ ही जाती हैं

और एक बार
जब हो जाता है ध्वंस
तब होता नहीं आसान 
नयी बुनियाद का
अस्तित्व।

~यशवन्त माथुर©

9 comments:

  1. बहुत सुन्दर भावनात्मक प्रस्तुति मोदी संस्कृति:न भारतीय न भाजपाई . .महिला ब्लोगर्स के लिए एक नयी सौगात आज ही जुड़ें WOMAN ABOUT MAN

    ReplyDelete
  2. और एक बार
    जब हो जाता है ध्वंस
    तब होता नहीं आसान
    नयी बुनियाद का
    अस्तित्व।-----वाह बहुत सुंदर जीवन से जुडी रचना
    बधाई

    ReplyDelete
  3. बहुत खूबसूरती से व्यक्त किया है आपने यशवंत भाई.

    ReplyDelete
  4. जनाब मैं तो कहता हूँ दीवारें होती ही क्यों है | बहुत सुन्दर रचना | आभार

    कभी यहाँ भी पधारें और लेखन भाने पर अनुसरण अथवा टिपण्णी के रूप में स्नेह प्रकट करने की कृपा करें |
    Tamasha-E-Zindagi
    Tamashaezindagi FB Page

    ReplyDelete
  5. sahi baat ko kavyatmak roop diya hai.. achhi rachna
    shubhkamnayen

    ReplyDelete
  6. सुन्दर रचना...
    जीवन से जुड़ी हुई...

    ReplyDelete
  7. रिश्तों के टूटने बिखरने को बहुत ही खूबसूरती से व्यक्त किया है..
    ;-)

    ReplyDelete
+Get Now!