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29 September 2010

नहीं चाहता पुनर्जीवन

हाँ
लगता है
सारे सपने कहीं खो गए हैं
जो देखे थे-
एक पल को लगा था
शायद सच होने वाले हैं
और मैं
आज़ाद होने वाला हूँ
एक रोशनी दिखी थी
पर ये नहीं मालूम था
कि एक बार फिर से
अँधेरे में  खो जाऊंगा
और अब
अब तो कोई तमन्ना ही नहीं है
इस सन्नाटे से
इस अँधेरे से
बाहर आने की
लक्ष्य विहीन
एक अंतहीन सोच में डूबा हुआ
मैं
मैं-अब और नहीं चाहता पुनर्जीवन
मैं अपने खोए हुए सपनों
में  कहीं खो जाना चाहता हूँ
फिर वापस न आने के लिए.


13 comments:

  1. बहुत खूब । खो जाईये जनाब। बहुत बहुत आशीर्वाद। मगर इधर नीचे दिये पते पर हो के जाईयेगा|आप अच्छा लिखते हैं दिल से भी और संवेदनशील भी। बधाई
    www.veerbahuti.blogspot.com
    dhanyavaad|

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  2. bahut badhiya...bhaavapurn kavita.

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  3. बहुत सुंदर..जिस दिन मोहमाया से ऊपर उठ गए...फिर वापस न आने का ज्ञान हो गया...दुनिया से कोई गिला-शिकवा रहेगा ही नहीं...अगर यह निराशा नहीं है तो...शायद कहीं से परमात्मा में खोने की शुरुवात..

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  4. bahut sundar rachna....lekin kahin kuchh nirasha ki jhalak bhi hai.... kyun ?

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  5. आदरणीया निर्मला जी,कृपया अपना आशीर्वाद यूँ ही बनाये रखियेगा इसकी बहुत ज़रुरत है मुझे.

    अरविन्द जी आप को भी बहुत बहुत धन्यवाद.

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  6. आदरणीया वीना जी और दीदी,-हाँ कुछ हद तक निराशा का भाव है इस कविता में जो शायद स्वाभाविक है.

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  7. आपकी किसी नयी -पुरानी पोस्ट की हल चल कल 01-09 - 2011 को यहाँ भी है

    ...नयी पुरानी हलचल में आज ... दो पग तेरे , दो पग मेरे

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  8. सुन्दर लिखा है यशवंत जी,
    सादर बधाई और शुभकामनाएं...

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  9. निराशा को इतना हावी नही होने देना चाहिये।

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  10. bahut bhavpoorn ...samvedansheel rachna ...asha...nirasha ko sath le kar hi jeevan chalata hai ...haan..hatasha nahin aani chahiye ...

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  11. बहुत गहन गंभीर भावाभिव्यक्ति है यशवंत जी ! मन को सम्वेदित करती बेहतरीन प्रस्तुति ! अति सुन्दर !

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  12. मैं
    मैं-अब और नहीं चाहता पुनर्जीवन
    मैं अपने खोए हुए सपनों
    में कहीं खो जाना चाहता हूँ
    फिर वापस न आने के लिए. ..
    बाह्य जगत से विमुख हुए मन की अंतर्जगत में अपने को खोजने की इच्छा ..सूफी चिंतन युक्त मार्मिक प्रस्तुति..
    सादर अभिनन्दन सर !!

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