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20 February 2013

सपनों की दुनिया

(Photo-from a facebook friend's wall )
न ये वादियाँ हैं अब
न बहते झरने हैं
न नदियां है अब
न फूलों पे मँडराते भँवरे हैं
यूं सफेदी सा बहता पानी

अब सपना सा लगता है
कंक्रीट के जंगलों में
काला धुआँ सा उड़ता है
विकास है या विनाश
ये मुझको पता नहीं
पर सपनों की जन्नत से
कभी मन हटता नहीं
सोकर उठता हूँ अब
रोज़ देर से सवेरे
चहक कर दर पे मेरे
कोई पंछी जगाता ही नहीं।
 
©यशवन्त माथुर©

17 comments:

  1. यह सपनों की कहाँ हकीकत की दुनिया है ...अब परिंदों की चहचहाहट कहाँ सुनाई देती है ...

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  2. यह सपनों की नहीं हकीकत की दुनिया है ... सटीक प्रस्तुति

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  3. बहुत कुछ बदल गया माथुर जी,बहुत ही सार्थक प्रस्तुति.

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  4. अब तो ये सब सुंदर सपने सा जहाँ हो गया ...
    ~God Bless!!!

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  5. महानगर में पंछियों की जगह कहाँ बनाते हैं इंसान ...

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  6. इंसान ने ही ये हाल किया है...अब भी सम्हाल लें तो काफी है...

    सार्थक रचना.
    सस्नेह
    अनु

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  7. कंक्रीट के जंगल मे कहाँ ये संभव है ?

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  8. आज कि विडम्बना को दर्शाती यथार्थ परक रचना !

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  9. अब तो यही कह सकते हैं मेरा सुन्दर सपना बीट गया
    गुज़ारिश : ''..महाकुंभ..''

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  10. आपकी यह बेहतरीन रचना शनिवार 23/02/2013 को http://nayi-purani-halchal.blogspot.in पर लिंक की जाएगी. कृपया अवलोकन करे एवं आपके सुझावों को अंकित करें, लिंक में आपका स्वागत है . धन्यवाद!

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  11. सार्थक रचना

    माथुर जी इस समाज के बनाने में हमारा योगदान भी रहा है जो संकट हम ने खुद म़ोल लिया है उसे तो झेलना ही पड़ेगा

    मेरी नई रचना

    खुशबू

    प्रेमविरह

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  12. आज के हालत पर सटीक प्रस्तुति..

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