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06 February 2013

इन राहों पर- चौराहों पर.........

इन राहों पर- चौराहों पर
जब भी खुद को पाता हूँ
शोर के संगीत सुरों में
कुछ यूं ही गुनगुनाता हूँ

चाहा तो लिखना बहुत है
चाहा तो कहना बहुत है
बीच राह पर चलते चलते
गिरना कभी संभलना बहुत है

लिखने को कलम तलाश कर
कहने को ज़बान तराश कर
मन की किताब के कोरे पन्ने पर
लिखता कुछ मिटाता हूँ

कहता कुछ समझाता हूँ
बस यूं ही आता जाता हूँ
इन राहों पर- चौराहों पर
जब भी खुद को पाता हूँ

©यशवन्त माथुर©

9 comments:

  1. सुंदर भाव यशवंत ....
    शुभकामनायें ....

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  2. स्वयं से संवाद करती सी रचना .... सुंदर प्रस्तुति

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  3. बहुत बढ़िया है भाई-

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  4. बहुत बढ़िया लिखा है यशवंत...

    सस्नेह
    अनु

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  5. बीच राह पर चलते चलते
    गिरना कभी संभलना बहुत है
    बहुत बढ़िया रचना... बधाई

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  6. इस शोर में कुछ भी लिखना कहाँ मुमकिन है

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  7. शुभ प्रभात
    शानदार रचना
    इसका लिंक ट्विटर पर भी
    @4yashoda

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  8. बहुत ही सुन्दर सार्थक प्रस्तुती।

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