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09 February 2013

एक दिन मैं भी इनमे बैठूँगा

आसमान से गुज़रा
हवाई जहाज़
और उसी क्षण
सामने की पटरी से
गुजरती रेल

पलक झपकते
दोनों का गायब हो जाना
मंज़िल से चल कर
मंज़िल की ओर
फिर आना
फिर से जाना
कितने ही चक्कर
रोज़ लगाना

उस पार की
गंदी बस्ती में
रहने वाला
काला-मैला
4 साल का छोटू
नज़रों के सामने से
और सिर के ऊपर से
भागते
सपनों को थामने की
कोशिश करता हुआ
माँ से कहता है -
एक दिन मैं भी
इनमे बैठूँगा !

©यशवन्त माथुर©

7 comments:

  1. बहुत ही सुन्दर भावपूर्ण प्रस्तुती,सबके सपने साकार हों।

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  2. उस पार की
    गंदी बस्ती में
    रहने वाला
    काला-मैला
    4 साल का छोटू
    नज़रों के सामने से
    और सिर के ऊपर से
    भागते
    सपनों को थामने की
    कोशिश करता हुआ
    माँ से कहता है -
    एक दिन मैं भी
    इनमे बैठूँगा !

    निःशब्द करती विचारणीय रचना जो सदैव पूरा होता ही है बस उसे संवारनेवाला होना चाहिए ...

    ReplyDelete
  3. बहुत ही सुन्दर प्रस्तुति....

    ReplyDelete
  4. छोतु के हौसले उसे एक दिन ज़रूर अवसर देंगे हवाई जहाज में बैठने के ... सुंदर अभिव्यक्ति

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  5. सुन्दर अभिव्यक्ति यशवंत भाई !

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