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14 April 2013

न यह गजल है न कविता है

न यह गजल है
न कविता है
इस में न छंद
न रस ही मिलता है

यह तो बस जज़्बात है
और कुछ मन की बात है
जो व्याकरण के नियमों में
न बंधता है न घुलता है

इसे ऐसा ही रहने दो
ये जैसा है बस वैसा है
बिखरा बिखरा सा कुछ
इन 'पंक्तियों' के रूप में

जो सोचता है मन
वो ही कहता है
न यह गजल है
न कविता है


~यशवन्त माथुर©

15 comments:

  1. जो सोचता है मन वही अन्तर्मन का दर्पण है .जो कविता के रुप में पन्नों पर बिखर जाते है सुन्दर भाव..

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  2. जो है मुझे
    भाया है
    लुभाया है
    बुलाया है
    शुभकामनायें ...

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  3. जो भी है ...पढ़कर अच्छा लगा ...सच्चा लगा ...!!!!

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  4. मन के जज्बात के लिए किसी रस छंद की आवश्यकता नही,बेहतरीन रचना.

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  5. असल तो अहि है जो मन कहता है .. बस दुनिया इसे कोई नम दे देती है ...

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  6. बहुत सुन्दर....बेहतरीन प्रस्तुति!!!
    पधारें "आँसुओं के मोती"

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  7. आपकी इस प्रविष्टि क़ी चर्चा सोमवार [15.4.2013]के चर्चामंच1215 पर लिंक क़ी गई है,
    अपनी प्रतिक्रिया देने के लिए पधारे आपका स्वागत है | सूचनार्थ..

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  8. विचारपूर्ण
    सुंदर रचना
    उत्कृष्ट प्रस्तुति

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  11. आपकी यह बेहतरीन रचना बुधवार 17/04/2013 को http://nayi-purani-halchal.blogspot.in पर लिंक की जाएगी. कृपया अवलोकन करे एवं आपके सुझावों को अंकित करें, लिंक में आपका स्वागत है . धन्यवाद!

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  12. zazbat hi kafi hai ,banaye rakhiye bahut khoob

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  13. जो सोचता है मन
    वो ही कहता है
    न यह गजल है
    न कविता है

    यही तो सच्ची कविता है .....

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  14. बढ़िया है......
    क्या है इससे क्या करना.....

    सस्नेह
    अनु

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  15. खुबसूरत अल्फाजों में पिरोये जज़्बात....शानदार |

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