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07 April 2013

यशवन्त....


यशवन्त करे न चाकरी,यशवन्त करे न काम। 
पाठक सारे भाग चलें,पढ़ कर इसी का नाम। । 

पढ़ कर इसी का नाम, हर सुबह से शाम। 
बे सिर पैर बक बक करे,बुद्धि इसकी जाम। । 

बुद्धि इसकी जाम,बुद्धिजीवी धोखा खाता ।
चश्मुद्दीन उपनाम,यह तो मन की कहता जाता। ।

~यशवन्त माथुर©

14 comments:

  1. बहुत सुन्दर यशवंत भाई. पाठक को भागने दीजिये. पर आप बिलकुल अपने मन की ही करिये. बहुत अच्छा काम कर रहे हैं आप. शुभकामनायें.

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  2. अब क्या तारीफ़ करें आपकी
    खुद को ही दे दिए सारे नाम
    कुछ ना छोड़ा औरों के वास्ते
    आपको क्या दें हम उपनाम

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  3. hahahhahaha...
    hansi ki baat alag par bahut achha likha hai.....

    shubhkamnayen

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  4. :-)

    self portrait!!!!
    enjoyed!!!
    anu

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  5. लीजिए पाठक आ गया,बेहतरीन प्रस्तुति,आभार.

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  6. वाह: बहु बढ़िया.यशवंत..

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  7. यशवन्त करे न चाकरी,यशवन्त करे न काम।
    पाठक सारे भाग चलें,पढ़ कर इसी का नाम। ..

    लो जी हम तो भागने की बजाए आ गए ...
    अच्छी है यशवंत जी ...

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  8. हाहा बेहतरीन! वैसे किसकी मजाल है जो आपके इन अनूठे रचनाओं को पढ़े बिना भाग जाय!!

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  9. पाठक तो भागे नहीं ,चर्चा मंच पर ले आए
    आपकी रोचक रचना की ढेरों शुभकामनाएँ

    आपकी इस प्रविष्टी की चर्चा कल सोमवार (08 -04-2013) के चर्चा मंच 1208 पर लिंक की गई है कृपया पधारें.आपकी प्रतिक्रिया का स्वागत है | सूचनार्थ

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  10. भागकर कितनी दूर जायेंगे आखिर ..... दुनिया जो गोल है फिर कहाँ भागना .....
    बहुत खूब...

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  11. भागकर कितनी दूर जायेंगे आखिर ..... दुनिया जो गोल है फिर कहाँ भागना .....
    बहुत खूब...

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  12. bahut pasand aayi kabhi kabhi apne baare me bhi jarur likhna chahiye

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  13. बहुत सुन्दर यशवंत भाई

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  14. भागकर कितनी दूर जायेंगे...बेहतरीन प्रस्तुति !!
    पधारें "आँसुओं के मोती"

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