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01 April 2013

मूर्ख ही तो हैं.....

 (2 वर्ष पूर्व 2011 मे लिखी गयी यह पंक्तियाँ इस वर्ष पुनः प्रकाशित)

फुटपाथों पर जो रहगुज़र किया करते हैं 
सड़कों पर जो घिसट घिसट कर चला करते हैं 
हाथ फैलाकर जो मांगते हैं दो कौर जिंदगी के 
सूखी छातियों से चिपट कर जो दूध पीया करते हैं 
ईंट ईंट जोड़कर जो बनाते हैं महलों को 
पत्थर घिस घिस कर खुद को घिसा करते हैं 
तन ढकने को जिनको चीथड़े भी नसीब नहीं 
कूड़े के ढेरों में जो खुद को ढूँढा करते हैं 
वो क्या जानें क्या दीन क्या ईमान होता है 
उनकी नज़रों में तो भगवान भी बेईमान होता है 
ये जलवे हैं जिंदगी के ,जलजले कहीं तो हैं 
जो इनमे भी जीते हैं, मूर्ख ही तो हैं.
~यशवन्त माथुर©

10 comments:

  1. aapki himmat ki to dav deni hogi Yaswant bhai jo aap itna dard likh paate ho ....


    new post  किसान और सियासत

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  2. दीन और ईमान जानकर भी तो लोग उससे दूर ही रहना पसंद करते हैं..न जानने पर कम से कम वे उससे दूर जाने का अपराध तो नहीं करते..मार्मिक रचना !

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  3. मुर्खता दिवस की शुभकामनयें :)

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  4. बहुत दर्द भरी मार्मिक अभिव्यक्ति..

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  5. जिनकी नजरों में धर्म और ईमान होता है वे भी तो उसे भुला ही देते हैं..भगवान को मानने वाले भी उससे अनजान ही रहते हैं..मार्मिक रचना !

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  6. आपकी इस उत्कृष्ट प्रविष्टि की चर्चा कल मंगल वार2/4/13 को चर्चा मंच पर राजेश कुमारी द्वारा की जायेगी आपका वहां स्वागत है

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  7. कठिन जीवन की विवशता भी और भगवान् से शिकायत भी पर सबसे ऊपर जीने का भरपूर जज़्बा ...जिसे ना भगवान का लेखा तोड़ पाया ...ना समाज की विषमताएं ...बहुत जबरदस्त रचना

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  8. बेहद मार्मिक रचना..

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