बीतते वक़्त की
तरह
मैं भी
बीत जाना चाहता हूँ
और
छोड़ जाना चाहता हूँ
कुछ निशाँ
कल फिर
याद आने के लिए.
तरह
मैं भी
बीत जाना चाहता हूँ
और
छोड़ जाना चाहता हूँ
कुछ निशाँ
कल फिर
याद आने के लिए.
बहुत ही साधारण लिखने वाला एक बहुत ही साधारण इंसान जिसने 7 वर्ष की उम्र से ही लिखना शुरू कर दिया था। वाणिज्य में स्नातक। अच्छा संगीत सुनने का शौकीन। ब्लॉगिंग में वर्ष 2010 से सक्रिय। एक अग्रणी शैक्षिक प्रकाशन में बतौर हिन्दी प्रूफ रीडर 3 वर्ष का कार्य अनुभव।
bahoot khoob.....
ReplyDeleteलाजवाब क्षणिका। शुभकामनायें
ReplyDeleteबहुत खूब्…………शानदार्।
ReplyDeleteआपका मन सही कह रहा है. कुछ निशां नहीं छोड़े तो समझो बिलकुल मिट गए. बधाई.
ReplyDeletewww.dunali.blog.com
अच्छे भावों की सुन्दर क्षणिका
ReplyDeleteSundar.
ReplyDelete---------
पैरों तले जमीन खिसक जाए!
क्या इससे मर्दानगी कम हो जाती है ?
sundar !bahut sahi ! shubhkamnayen !
ReplyDeleteअच्छी लगी क्षणिका .... बहुत खूब
ReplyDeleteप्रिय यशवंत जी
ReplyDeleteसस्नेह अभिवादन !
छोड़ जाना चाहता हूं
कुछ निशां
कल फिर
याद आने के लिए
बहुत प्यारी क्षणिका लिखी भाई !
चलती रहे , निखरती रहे आपकी लेखनी … अस्तु !
भुलाना मुझे इतना आसां न होगा
कई दास्तानें दिये जा रहा हूं …
…और तीन दिन पहले आए
विश्व महिला दिवस की हार्दिक बधाई !
शुभकामनाएं !!
मंगलकामनाएं !!!
♥मां पत्नी बेटी बहन;देवियां हैं,चरणों पर शीश धरो!♥
- राजेन्द्र स्वर्णकार
bahut khub
ReplyDelete------------
देवेन्द्र दत्त मिश्र जी से मिलवाने के लिए आभार...
bahut khoob Yashvant ji ...
ReplyDeleteआप सभी का बहुत बहुत धन्यवाद!
ReplyDeleteहोली की अपार शुभ कामनाएं...बहुत ही सुन्दर ब्लॉग है आपका....मनभावन रंगों से सजा...
ReplyDeleteशानदार् शानदार् शानदार्....अच्छी लगी क्षणिका यशवंत भाई
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